सरस्वती (जैन धर्म)
वृहद् भारतीय परंपरा में ज्ञान-विद्या,नृत्य, संगीत, कला आदि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का विशिष्ट महत्त्व है इस तथ्य का प्रमाण यह है कि भारतीय मूल के सभी धर्मों में वैदिक,जैन एवं बौद्ध आदि में सरस्वती देवी को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है |
जैन धर्म[1]

[2]जिनवाणी के साथ देवता और भगवती शब्दों का प्रयोग मात्र आदर सूचक है सरस्वती ( स+रस+वती अर्थात रस से परिपूर्ण प्रकृति ) पद का प्रयोग मात्र जिनवाणी के रूप में हुआ है और उस जिनवाणी को रस से युक्त मानकर यह विशेषण दिया गया |
जैनागम में जैनाचार्यो ने सरस्वती देवी के स्वरूप की तुलना भगवान की वाणी से है; यथार्थत: सरस्वती देवी की प्रतिमा द्वादशांग का ही प्रतीकात्मक चिन्ह है
षट्खण्डागम- धवला भाग १ धवला
बारहअंगंगिज्जा वियलिय-मल-मूढ-दंसणुत्तिलया। विविह-वर-चरण-भूसा पसियउ सुयदेवया सुइरं।। [3]
अर्थ - बारह प्रकार के अंग ( द्वादशांग ) जिससे ग्रहण होते हैं, जिससे समस्त प्रकार के कर्म मल और मूढ़ताएं दूर होती हैं-इस प्रकार के सम्यक दर्शन की जो तिलक स्वरूप हैं, विविध प्रकार के श्रेष्ठ सदाचरण रूपी भाषा से युक्त है, जिसके चरण विविध प्रकार के आभूषणो से मण्डित है ऐसी श्रुतदेवी चिरकाल तक मेरें ऊपर प्रसन्न रहें |
आचार्य कुन्दकुन्द देव श्रीश्रुतभक्ति मे सरस्वती देवी की आराधना करते हुए कहते हैं कि यथा-
अरिहंतभासियत्थं गणहरदेवेहिं गंथियं सम्मं।पणमामि भत्तिजुत्तो सुदणाणमहोवहिं सिरसा।।
अर्थ -उस श्रुतज्ञान रूपी महासमुद्र को भक्ति से युक्त होकर सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ, जो अरिहन्त द्वारा कहा गया है एवं गणधरों द्वारा सम्यव् प्रकार से रचा गया है।
यथार्थत: सरस्वती देवी की प्रतिमा द्वादशांग का ही प्रतीकात्मक चिह्न है। ग्रंन्थ प्रतिष्ठासारोद्धार में जैन सरस्वती देवी के संबंध में निम्न श्लोक उपलब्ध हैं-
वाग्वादिनी भगवती सरस्वती, ह्रीं नम:इत्यनेन मूलमन्त्रेणवेष्टयेत्।ओं ह्रीं मयूरवाहिन्यै नम:, इति वाग्देवतां स्थापयेत्।।
जैनचार्य वीरसेन ने भी सरस्वती देवी को जयदु सुददेवता से सम्बोधन कर यह प्रमाणित कर दिया कि जो जैनागम में चार प्रकार के देव-देवियों के देव-देवियों का वर्णन है,उसमें श्रुतदेवी कोई देवी नहीं है वरन् जिनेन्द्र भगवान की दिव्यध्वनि स्वरूप श्रुतदेवी सरस्वती है।
कहा भी है-
जिनेश्वरस्वच्छसर:सरोजिनी, त्वमंगपूर्वादिसरोजराजिता।गणेशहंसव्रजसेविता सदा, करोषि केषां न मुदं परामिह।।
(श्री पद्मनन्दि पंचविंशतिका, आचार्य पद्मनंदी, १५/२१)
अर्थ:— हे माता! हे सरस्वती! तुम जिनेश्वर रूपी निर्मल सरोवर की तो कमलिनी हो और ग्यारह अंग चौदह पूर्व रूपी कमल से शोभित हो और गणधर रूपी हंसों के समूह से सेवित हो, इसलिए तुम इस संसार में किसको उत्तम हर्ष की करने वाली नहीं हो?
अध्यात्मयोगी आत्मस्वरूप के अमर गायक आचार्य कुन्दकुन्ददेव श्रुतभक्ति/ सरस्वती की स्तुति करते हुए अपने जिन भावों को शब्दाक्षर द्वारा इस प्रकार लिपिबद्ध करते हैं—
सिद्धवरसासणाणं, सिद्धाणं कम्मम्चक्कमुक्काणं।
कादूण णमोक्कारं, भक्तीए णमामि अंगादिं।।
अर्थ:- जिनका अहिंसामय उत्कृष्ट जैनशासन लोक में प्रसिद्ध है तथा जो (घातिया और अघातिया रूप अष्ट) कर्मों के चक्र से मुक्त हो चुके हैं, ऐसे सिद्धों को नमस्कार कर भक्तिपूर्वक द्वादशांग रूप सरस्वती (बारह अंगों को मैं आचार्य कुन्दकुन्द नमस्कार करता हूँ।
जहि संभव जिणवर-मुहकमल।
सत्तभंग-वाणी जसु अमल।।
आगम-छंद-तक्क वर वाणि।
सारद सद्द-अत्थ-पय खाणि।।१।।
गुणणिहि बहु विज्जागमसार।
पुठि मराल सहइ अविचार।।
छंद बहत्तरि-कला-भावती।
सुकइ ‘रल्ह’ पणवइ सरसुती।।२।।
(महाकवि रल्ह)
अर्थ:- जो शारदा जिनेन्द्र भगवान के मुखरूपी कमल से प्रकट हुई है, जिसकी सप्तभंगमयी वाणी है, जो आगम, छंद एवं तक्र से युक्त है, -ऐसी शारदा शब्द, अर्थ एवं पद की खान है। जो गुणों की निधि एवं विद्या तथा आगम की सार-स्वरूपा है, जो स्वभावत: हंस की पीठ पर सुशोभित है, जिसे छंद एवं बहत्तर कलाएँ प्रिय हैं—ऐसी सरस्वती को ‘रल्ह’ कवि नमस्कार करता है।।१।।
स्वरूप
जैन धर्म की सरस्वती (श्रुतदेवी) के प्रारम्भिक स्वरुप मे एक मुख, चार हाथ हैं; वो हाथों में कमंडलु ,अक्षमाला ,कमल व शास्त्र धारण किये हुये है | किन्तु अन्य विभिन्न स्वरुप भी दृष्टिगोचर होते है जिनमे हाथों में कमंडलु , कमल, अंकुश व वीणा देखी जा सकती है; एवम आसन के रुप मे कमल, हंस व मयुर है |
प्रतिष्ठातिलक ग्रंथ[4] आचार्य नेमिचन्द्र - सरस्वती स्तोत्र
बारह अंगंगिज्जा, दंसणतिलया चरित्तवत्थहरा।चोद्दसपुव्वाहरणा, ठावे दव्वाय सुयदेवी।।१।।आचारशिरसं सूत्र-कृतवक्त्रां सुवंठिकाम्।स्थानेन समवायांग-व्याख्याप्रज्ञप्तिदोर्लताम् ।।२।।वाग्देवतां ज्ञातृकथो-पासकाध्ययनस्तनीम्।अंतकृद्दशसन्नाभि-मनुत्तरदशांगत: ।।३।।सुनितंबां सुजघनां, प्रश्नव्याकरणश्रुतात्।विपाकसूत्रदृग्वाद-चरणां चरणांबराम् ।।४।।सम्यक्त्वतिलकां पूर्व-चतुर्दशविभूषणाम्।तावत्प्रकीर्णकोदीर्ण-चारुपत्रांकुरश्रियम्।।५।।
अर्थ - बारह अंगों में से प्रथम जो ‘आचाराँग’ है, वह श्रुतदेवी-सरस्वती देवी का मस्तक है, ‘सूत्रकृतांग’ मुख है, ‘स्थानांग’ कंठ है, ‘समवायांग’ और ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’ ये दोनों अंग उनकी दोनों भुजाएं हैं, ज्ञातृकथांग’ और ‘उपासकाध्ययनांग’ ये दोनों अंग उस सरस्वती के दो स्तन हैं, ‘अंतकृद्दशांग’ यह नाभि है, ‘अनुत्तरदशांग’ श्रुतदेवी का नितंब है, ‘प्रश्नव्याकरणांग’ यह जघन भाग है, ‘विपाकसूत्रांग और दृष्टिवादांग’ ये दोनों अंग उन सरस्वती के दोनों पैर हैं। ‘सम्यक्त्व’ यह उनका तिलक है, चौदह पूर्व ये अलंकार हैं और ‘प्रकीर्णक श्रुत’ सुन्दर बेल बूटे सदृश हैं।
नाम
जैन दर्शन में अरिहंतों द्वारा भाषित होने से इन्हें जिनवाणी,अरिहंतवाणी,श्रुतदेवी,वाग्देवी,भारती,वागेश्वरी आदि अनेक नामों से अभिहित किया गया है |
नवमं च जगन्माता, दशमं ब्राह्मिणी तथा।एकादशं तु ब्रह्माणी, द्वादशं वरदा भवेत्।।
पञ्चदशं श्रुतदेवी, षोडशं र्गौिनगद्यते।।(सरस्वती नाम स्तोत्रम् , ४-७)
अर्थ:- प्रथम वह भारती हैं, द्वितीय सरस्वती। शारदा देवी उनका तृतीय नाम है और चतुर्थ हंसगामिनी ।।४।। विदुषी,वागीश्वरी, कुमारी, ब्रह्मचारिणा ये उनके पंचम-पष्ठ-सप्तम और अष्टम नाम हैं ।।५।।नौवाँ नाम जगन्माता, दशवाँ नाम ब्राह्मिणी, ग्याहरवाँ नाम ब्रह्माणी और बारहवाँ नाम वरदा है।।६।। तेरहवाँ नाम वाणी, चौदहवाँ नाम भाषा, पन्द्रहवाँ नाम श्रुतदेवी, सोलहवाँ नाम गौ हैं। इस प्रकार ये सरस्वती देवी के सोलह नाम हैं।
सरस्वती वंदना-
अरिहन्त भासियत्थ्ं गणहरदेवेहिं गंथियं सव्वं |
पणमामि भत्तिजुत्तो सुदणाणमहोवयं सिरसा ||
सरस्वती स्तोत्र-
चन्द्रार्क-कोटिघटितोज्ज्वल-दिव्य-मूर्ते!
श्रीचन्द्रिका-कलित-निर्मल-शुभ्रवस्त्रे!
कामार्थ-दाय-िकलहंस-समाधिरूढ़े।
वागीश्वरि! प्रतिदिनं मम रक्ष देवि!।।1।।[5]
त्यौहार-
जैनधर्म में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पंचमी को जैन ज्ञानपंचमी या श्रुत पंचमी भी कहते हैं और उस दिन श्रुतदेवी एवं शास्त्रों की विधिवत् पूजा का विधान दिगम्बरों में है तथा र्काितक मास की शुक्ल पंचमी को श्रुत देवी की पूजा का विधान श्वेताम्बर जैन परम्परा में है।
पुरातात्विक इतिहास[6] [7]
वैदिक (सनातन) एवं बौद्ध धर्मो की अपेक्षा जैन धर्म की सरस्वती (श्रुतदेवी) के वृहद स्तर पर पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | जैन शिल्प में यक्षी, अंबिका एवं चक्रेश्वरी के बाद सरस्वती ही सर्वाधिक लोकप्रिय देवी रही है | सरस्वती (श्रुतदेवी) की सबसे प्राचीन प्रतिमा कंकाली टीले (मथुरा) से प्राप्त हुई है जो १३२ ई, की है ; इसके अतिरिक्त जैन परंपरा में बहुत ही सुंदर सरस्वती (श्रुतदेवी) प्रतिमाएं पल्लू (बीकानेर) और लाडनूँ आदि से प्राप्त हुई है |
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जैन धर्म की सरस्वती (श्रुतदेवी)
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क्र०
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चित्र
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वर्ष्
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विवरण
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१३२ ई०
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कंकाली टीला (मथुरा)
इस पर ब्राम्ही लिपि मे लेख लिखा है कुषाण काल से सम्बन्धित वर्तमान मे लखनऊ संग्रहालय मे संरक्षित
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1034 ई०
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भोज शाला, धार ,मध्य प्रदेश किन्तु वर्तमान मे ब्रिटिश
म्युजियम मे
ब्रिटिश म्यूजियम, लन्दन, में धारा के खंढहरों से प्राप्त वाग्देवी की एक खंडित प्रतिमा है। प्रतिमा की पादपीठ पर अभिलिखित लेख (जो कहीं–कहीं त्रुटित है) के अनुसार वाग्देवी की यह प्रतिमा राजा भोज की चन्द्रनगरी धारा में सूत्रधार हिरसुत मनथल (मणथल) ने बनाई थी और उस पर लेख संवत् १०९१ (सन् १०३४ ई.) में शिवदेव ने लिखा था। मुकुटधारिणी वस्त्राभूषण अलंकृता इस खड्गासन सरस्वती मूर्ति के शीर्ष के शीर्ष के दक्षिण पार्श्व में जिनदेव की मूर्ति का अंकन है। दायें हाथ में ऊपर की ओर वह अंकुश धारण किये हुए है। दोनों ओर हाथ क्षतिग्रस्त हैं, बायें हाथ का आगे का भाग क्षतिग्रस्त है। जितना अवशिष्ट है उससे अनुमान होता है कि वह उसमें अक्षमाला धारण किये रही होगी। शीर्ष के बायें पार्श्व में भी कुछ आकृतियाँ बनी हुई हैं, जो अस्पष्ट हैं। देवी के दाहिने पैर के में भी कुछ आकृतियाँ बनी हुई हैं। इनमें से ऊपर वाली प्रौढ़ पुरुष आकृति को राजा
भोज से तथा नीचे की युवा आकृति को श्रीफल लिये हुए महाकुमार से पहचाना गया है। उसी प्रकार देवी के बायें पैर के पार्श्व में भी ऊपर—नीचे दो आकृतियां बनी हुई हैं।[9]
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११ वी-१२वी शतब्दी
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पन्चकुटी बस्ती ,सिमोंग जिला, कर्नाटक
Sarasvati, seated in dhyana-mudra without vahana, in all cases shows
abhayaksha, goad, noose and manuscript. The face although much mutilated, has
at least some suggestions of power through large open eyes, open lips and
even somewhat swollen nose
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दिलवाडा जैन मन्दिर, माउन्ट आबू ,राजस्थान
The figures of 16 armed goddess carved in a bhramikaceiling, depicts
here as sitting on bhadrasana in lalita-pose with swan and holding the
varada-mudra, a conch (suggesting her Vaishnavite character), small stick
(possibly measuring rod in two hands), a chain (in uppermost pair of hands) a
vina (in two hands), a noose, the kartari-mudra, an indistinct object, a
goad, the abhayaksha, a fruit, a manuscript and a water-vessel. The goddess
is joined by sixarmed dancing male figure on each side, thus suggesting her
command over musical power
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९५०-७० ई०
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Khajuraho,
(Chhatarpur district of Madhya Pradesh) has yielded eight figures of
Sarasvati wherein she, except for one instance58 is always four-armed.59The
figures, datable between c. 950-1100 A.D., depict her in lalita-mudra and as
holding a manuscript, a vina (either in one or two hands), a lotus (usually
in two hands) and also the varada-mudra (or a water-vessel or a rosary).
However, the vahana swan is carved only in one instance on the northern
adhisthana of the Parshvanatha temple (c. 950-70 A.D., Fig. 04)
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Ladnun (Nagaur, Rajasthan
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सन् १०१८ ई
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हिन्लाजगढ़, जिला मन्दसौर से प्राप्त वर्तमान मे केन्द्रीय संग्रहालय इन्दौर में संरक्षित खड्गासन में भग्न मूर्ति है। यह शीर्ष विहीन है और भुजाएँ भी क्षत—विक्षत हैं। देवी के दोनों और पार्श्व में कटि से नीचे खड़ी हुई एक एक स्त्री तथा दोनों चरणों में बैठे हुए दाहिने और एक पुरुष भक्त और बायीं ओर स्त्री भक्त की आकृति बनी हुई है।[9]
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१०वी-११वी शतब्दी
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पल्लू (बीकानेर) राजस्थान
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सन्दर्भ
- "CONCEPT OF SARASWATI IN JAIN TRADITION AND ART-Dr. Maruti Nandan Pd. Tiwari" (PDF).
- ↑ "जल का आधार घट ज्ञान का आधार सरस्वती - ENCYCLOPEDIA". hi.encyclopediaofjainism.com. अभिगमन तिथि 2020-04-13.
- ↑ "पुस्तक ०१ - ENCYCLOPEDIA". hi.encyclopediaofjainism.com. अभिगमन तिथि 2020-04-13.
- ↑ "प्रतिष्ठा तिलक - Pratishtha Tilak : नेमिचन्द्र - Nemichandra | Sanskrit Book PDF Download | Read Online |". ePustakalay Sanskrit (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2020-04-13.
- ↑ "Saraswati strotra". jainpuja.com. अभिगमन तिथि 2020-04-13.
- ↑ Dr. Shanti Swaroop Sinha, Dr. Maruti Nandan Pd. Tiwari. "CONCEPT OF SARASWATI IN JAIN TRADITION AND ART" (PDF).
- ↑ देश-विदेश में अतिप्राचीन जैन श्रुत देवी सरस्वती प्रतिमाएं, अभिगमन तिथि 2020-04-13






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